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Rs. 75.00
SKU: 9788181437181

ISBN: 9788181437181
Language: Hindi
Publisher: Vani Prakashan
No. of Pages: 92
पुस्तक के बारे में लेखक का यह वक्तव्य सारी कहानी कह जाता है। -‘डायरी 23 फरवरी, 1982 को ही पूरी हो चुकी थी, जो...

  • Book Name: ZikreAFiraq : Mere Nagmon Ko Neend Aati Hai
  • Author Name: Ramesh Chandra Dwivedi
  • Product Type: Book
  • ISBN: 9788181437181
Categories:
ISBN: 9788181437181
Language: Hindi
Publisher: Vani Prakashan
No. of Pages: 92
पुस्तक के बारे में लेखक का यह वक्तव्य सारी कहानी कह जाता है। -‘डायरी 23 फरवरी, 1982 को ही पूरी हो चुकी थी, जो आपके हाथ में ‘मेरे नग्मों को नींद आती हैं’ की शक्ल में है। मैं डायरी नहीं लिखता था, न डायरी लेखन की कला से ही मेरा कोई परिचय था। दरअसल बात वह थी कि मेरे गाँव, शहर के लोग और मेरे साथी-संगी या मेरे स्कूल और कॉलेज के दिनों के लोग ही ऐसे नहीं थे जिनकी बातें डायरी में नोट कर लेने के काबिल हो। हाँ, ऐसे लोग जरूर मिलते रहे जिन्होंने कुछ हद तक अपने व्यक्तित्व और आचरण से मुझे प्रभावित किया। मगर न तो किसी का रात-दिन का साथ ही रहा और न तो वे लोग ग़ैर-मामूली तरह के मामूली लोग ही थे। कभी कोई इधर-उधर का साधारण इन्सान मिल जाता था और इस काबिल होता था कि उसकी बातें मेरी चेतना की डायरी में दर्ज हो जायें, तो उसकी बातें अपने आप मेरी याददाश्त का हिस्सा बन जाती थीं। फिराक पहले और आखिरी ऐसे इन्सान थे, जिनके व्यक्तित्व ने मुझे साँप की चुम्बकीय आँखों या किसी विशाल तूफानी भँवर की तरह अपने केन्द्र में खींच लिया। जिस दिन से मुलाकात हुई उसी दिन से फिराक के बेशकीमती शब्दों के जवाहर पारों को मैं अपनी डायरी के दामन में समेटने के काम में जुट गया। और एक दिन यह एक-एक शब्द का अनमोल रत्न एक नायाब और वक्त के हाथों भी कभी न लुट सकने वाले खजाने की शक्ल अख्तियार कर गया, जिसके कुछ हिस्से कभी-कभी मेरे संस्मरणात्मक लेखों और पुस्तकों के रूप में उजागर होते रहे। डायरियाँ भरी पड़ी हैं फिराक से। धीरे धीरे इन डायरियों में दर्ज वाकयात और फिराक और उनके शब्द-संसार को पुस्तक की शक्ल में माननीय पाठकों की खिदमत में पेश करता आया हूँ और करता रहूँगा। क्या करूँ। अकेला हूँ। मेरी मजबूरियाँ हैं, तनहाइयाँ हैं, मेरी बीमारियाँ हैं, मेरी समस्याएँ हैं। न कोई यार, न मददगार। बस फिराक साहब की यादों का खुशगवार रेला और गुरुऋण से मुक्त होने की अदम्य अभिलाषा और ईश्वर-कृपा-ये ही मेरे सम्बल हैं, मेरी एकाकी और दुर्गम यात्रा के। जिन्दगी की शाम भी सर पर अपना साया पसारने लगी है। इस ओझल होती हुई सुरमई रौशनी में कितनी तेज दौड़ूँ कि मंजिल पा लूँ। मैं बिल्कुल दौडूँगा नहीं। अटूट आशा और उत्साह लिए चलते-चलते जहाँ पाँव थक जाएँगे गिर पड़ूँगा वही मंजिल होगी-वहीं पर फिराक, मेरे गुरुदेव खड़े होंगे अपने शिष्य रमेश की बाँह पकड़ने और उनका स्वागत करने के लिए।‘
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