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Rs. 250.00
SKU: 9789350721612

ISBN: 9789350721612
Language: Hindi
Publisher: Vani Prakashan
No. of Pages: 164
हिन्दी में शोध के आधार पर साहित्यिक या गैर-साहित्यिक लेखन बहुत ज्यादा नहीं हुआ है, जो हुआ है, उसमें विषय विशेष की सूक्ष्मता से...

  • Book Name: Sapnon Ki Mandi
  • Author Name: Geetashri
  • Product Type: Book
  • ISBN: 9789350721612
Categories:
ISBN: 9789350721612
Language: Hindi
Publisher: Vani Prakashan
No. of Pages: 164
हिन्दी में शोध के आधार पर साहित्यिक या गैर-साहित्यिक लेखन बहुत ज्यादा नहीं हुआ है, जो हुआ है, उसमें विषय विशेष की सूक्ष्मता से पड़ताल नहीं की गयी है । सपनों की मंडी के माध्यम से लेखिका गीताश्री ने तकरीबन एक दशक तक शोध एवं यात्राओं और उनके अनुभवों के आधार पर मानव तस्करी के कारोबार पर यह किताब लिखी है । इस किताब में ख़ास तौर पर आदिवासी समुदाय की लड़कियों की तस्करी, उनके शोषण और नारकीय जीवन का खुलासा किया है । किताब में कई चौंका देने वाले तथ्यों से पाठक रूबरू होते हैं । लेखिका ने सभ्य समाज और आदिवासी समाज के बीच जो अंतर है उसकी एक समाजशास्त्रीय ढंग से व्याख्या की है । किताब में जिंदगी के उस अंधेरे हिस्से की कहानी है, जिसमें एक बाज़ार होता है । कुछ खरीददार होते हैं । कुछ बेचने वाले होते हैं और फिर मासूम लड़कियों का सौदा । लेखिका कहती हैं कि ताज्जुब तो तब होता है जब बेचने वाला कोई सगा निकलता है । लेखिका स्पष्ट तौर पर कहना चाहती हैं की, सपनों की मंडी में मासूम लड़कियों के सपनों के सौदे की कहानी है । सपनों की कब्र से उठती हुई उनकी चीखें हैं ।हिन्दी में शोध के आधार पर साहित्यिक या गैर-साहित्यिक लेखन बहुत ज्यादा नहीं हुआ है, जो हुआ है, उसमें विषय विशेष की सूक्ष्मता से पड़ताल नहीं की गयी है । सपनों की मंडी के माध्यम से लेखिका गीताश्री ने तकरीबन एक दशक तक शोध एवं यात्राओं और उनके अनुभवों के आधार पर मानव तस्करी के कारोबार पर यह किताब लिखी है । इस किताब में ख़ास तौर पर आदिवासी समुदाय की लड़कियों की तस्करी, उनके शोषण और नारकीय जीवन का खुलासा किया है । किताब में कई चौंका देने वाले तथ्यों से पाठक रूबरू होते हैं । लेखिका ने सभ्य समाज और आदिवासी समाज के बीच जो अंतर है उसकी एक समाजशास्त्रीय ढंग से व्याख्या की है । किताब में जिंदगी के उस अंधेरे हिस्से की कहानी है, जिसमें एक बाज़ार होता है । कुछ खरीददार होते हैं । कुछ बेचने वाले होते हैं और फिर मासूम लड़कियों का सौदा । लेखिका कहती हैं कि ताज्जुब तो तब होता है जब बेचने वाला कोई सगा निकलता है । लेखिका स्पष्ट तौर पर कहना चाहती हैं की, सपनों की मंडी में मासूम लड़कियों के सपनों के सौदे की कहानी है । सपनों की कब्र से उठती हुई उनकी चीखें हैं ।v
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