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समय कि सतह पर बहते हुए इस किताब कि रचना कि गयी है। यह पुस्तक मोरवाल जी कि स्मृतियों का अतीत राग या फिर महज़ उनकी दास्तान नहीं है,बल्कि यह बदलते आधुनिक ग्रामीण-शहरी समाज के...

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    समय कि सतह पर बहते हुए इस किताब कि रचना कि गयी है। यह पुस्तक मोरवाल जी कि स्मृतियों का अतीत राग या फिर महज़ उनकी दास्तान नहीं है,बल्कि यह बदलते आधुनिक ग्रामीण-शहरी समाज के बहाने एक लेखक के क्रमिक विकास के साथ-साथ,एक समाजशास्त्रीय और मानवशास्त्रीय आख्यान भी है। इस पुस्तक में लेखक ने हमारी पुरानी भाषा को बहुत ही करीने से सजाया है जो लेखक को अपने देस कि याद दिलाती है और उससे प्रेरित करती है लौटने के लिए,अपने गाँव, अपने घर, अपनों के पास ताकि उसका अपनी माँ अपनी धरती से रिश्ता कभी टूटे न।

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