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प्रणय के संवेग मानव मन की प्रकृति है, सृष्टि में भला कौन होगा जिसे जीवन के ऐसे अन्तरंग पलों की अनुभूति नहीं हुई हो। कहते हैं, प्रणय को सृष्टि-निर्माता के इबादत का माध्यम माना गया...

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प्रणय के संवेग मानव मन की प्रकृति है, सृष्टि में भला कौन होगा जिसे जीवन के ऐसे अन्तरंग पलों की अनुभूति नहीं हुई हो। कहते हैं, प्रणय को सृष्टि-निर्माता के इबादत का माध्यम माना गया है, बशर्ते वह ह्नदय के समग्र सात्विक भाव से किया गया हो। आलोच्य कृति ‘इन्द्रधनुष के तीन रंग’ में प्रणय के सम-सामयिक प्रसंगों को पिरोया गया है। कुमारी माला 'कुहू' की कहानी ‘मिलन’ के हीर व रांझणा हों चाहे, गोरधन सुथार ‘मनु’ की कहानी ‘साजिशें-इश्क़ में’ के पात्र महेश और नेहल हों और चाहे मीरा कुमार ‘मीरु’ की कहानी ‘आभासी हकीकत’ के सागर और समीरा, कहीं न कहीं प्रणय के विभिन्न उपादानों से गुजरकर संयुक्ति को प्राप्त होते हैं। लेखकत्रय ने अपनी-अपनी कहानियों को अपने-अपने अन्दाज़ में बुना है और घटनाओं को पात्रोचित परिवेश व परिस्थितियों में ढ़ाल कर कथ्य को अपने चरम तक पहुँचाया है। कहानियों का सुखान्त पाठकीय रोचकता को जोड़े रखता है।
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