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SKU: 9789352292066

ISBN: 9789352292066
Language: Hindi
Publisher: Vani Prakashan
No. of Pages: 120
‘मेरा विश्वास निर्माण और निर्मित में है, जो मैं आज भी सीख रही हूँ। जो सब उपादान किताबें पढ़कर, जनमानस से परिचित होकर, पैदल-पाँव,...

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ISBN: 9789352292066
Language: Hindi
Publisher: Vani Prakashan
No. of Pages: 120
‘मेरा विश्वास निर्माण और निर्मित में है, जो मैं आज भी सीख रही हूँ। जो सब उपादान किताबें पढ़कर, जनमानस से परिचित होकर, पैदल-पाँव, घूम-फिरकर जुटाती हूँ, वह मेरे मन के पन्नों में दर्ज हो जाता है। इसमें जादू का अहसास भी शामिल है। असल में प्रत्यक्ष तर्जुर्बों की हमेशा जरूरत नहीं पड़ती। वैसे मेरी क्षमता का दायरा भी छोटा है। मैं उसमें विश्वसनीयता गढ़ने का प्रयास करती हूँ। मेहनत अन्वेषण और नित्यप्रति सीखते रहने का सिलसिला, आज भी खत्म नहीं हुआ। मुझे नहीं लगता कि प्रत्यक्ष अभिज्ञता ही आखिरी बात है। मैं कहीं पहुँचना चाहती हूँ, इसीलिए मैं निरंतर चलती रहती हूँ। अध्ययन, ग्रहण और सतत जागरूक मन के जरिए, मैं कथावस्तु को पकड़ने की कोशिश करती हूँ। ये सब अभिज्ञता मेरे मन में पलती-बढ़ती रहती है। मेरे मन को मथती रहती है। यही मेरी आस्था, मेरा विश्वास है। जिस दिन यह सब ‘ना’ हो जाएगा, मैं भी ‘ना’ हो जाऊँगी।’ उपन्यास का ये अंश लेखिका की रचनाशीलता का प्रमाण है।
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