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SKU: 9788170558019

ISBN: 9788170558019
Language: Hindi
Publisher: Vani Prakashan
No. of Pages: 112
पूज्य पिता महाप्राण पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की मृत्यु गत वर्ष 15 अक्टूबर 1961 को एक लम्बी अवधि की अस्वस्थता के साथ हुई। महाप्राण...

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ISBN: 9788170558019
Language: Hindi
Publisher: Vani Prakashan
No. of Pages: 112
पूज्य पिता महाप्राण पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की मृत्यु गत वर्ष 15 अक्टूबर 1961 को एक लम्बी अवधि की अस्वस्थता के साथ हुई। महाप्राण के अवसान का दिवस हिन्दी संसार के लिए अत्यन्त शोक का दिवस माना गया। महाप्राण का एकमात्र पुत्र होने के कारण मेरे उत्तरदायित्व सहज रूप से बढ़ गए। सबसे बड़ा उत्तरदायित्व यदि था तो यह कि उनकी कृतियों के पुनःप्रकाशन की व्यवस्था करना। कुछ प्रकाशकों ने उनकी कृतियों के प्रकाशन में जिस दरिद्रता का परिचय प्रस्तुत किया था वह महाप्राण के व्यक्तित्व के अनुरूप नहीं था, इस बात से सम्भवतः मेरे सभी शुभचिन्तकगण सहमत होंगे। अनेक कृतियों के प्रकाशनों ने पुनर्मुद्रण की भी व्यवस्था नहीं की तथा प्रचार-प्रसार के कार्य को भी स्थगित कर रखा। ऐसी परिस्थितियों में यह आवश्यक था कि महाप्राण के देहावसान के पश्चात् मैं उन त्रुटियों को अपनी दृष्टि में रखकर कुछ कार्य करूँ ताकि मेरे दायित्वों के प्रति कोई भी हिन्दी-प्रेमी उँगली न उठा सके। महाप्राण के देहावसान के एक वर्ष के भीतर ही मेरे निर्देशानुसार उनकी यह कृति सुन्दर सुसज्जित रूप में हिन्दी संसार के सम्मुख प्रस्तुत हो रही है। मैं भली-भाँति इस बात से सुपरिचित हूँ कि अनेक शुभचिन्तक अनेक प्रकार की बात मेरे समक्ष प्रस्तुत करेंगे, मैं उन्हें सुझावों के लिए आमन्त्रित करता हूँ ताकि मेरा पथ-निर्देश होता रहे। प्रस्तुत प्रकाशित कृति की आलोचना प्रस्तुत करना मेरा उद्देश्य नहीं है, इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि इस कृति को हिन्दी के अध्येताओं ने साहित्य की उपलब्धि माना है। हिन्दी के पाठक, विद्वान जिस प्रकार महाप्राण की कृतियों को सहज महत्त्व प्रदान करते रहे, उसी प्रकार वे अभी भी सहयोगपूर्ण महत्त्व देते रहेंगे, ऐसी मुझे आशा है। रामकृष्ण त्रिपाठी
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